महावितरण का सबसे खराब प्रदर्शन; जवाबदेही पर सवाल
नागपुर : खुद को एशिया की दूसरी सबसे बड़ी बिजली डिस्ट्रीब्यूशन कंपनी मानने वाली महाराष्ट्र स्टेट इलेक्ट्रिसिटी डिस्ट्रीब्यूशन कंपनी (महावितरण) अब देश में सबसे निचले लेवल पर पहुंच गई है। हाल ही में जारी एक नेशनल सर्वे में देश की 52 बिजली कंपनियों की लिस्ट में महावितरण को सीधे आखिरी (52वें) नंबर पर डाल दिया गया है। पिछले साल 15.5 पॉइंट पाने वाली महावितरण को इस साल 100 में से सिर्फ 1.5 पॉइंट मिले हैं, जिससे कंपनी को 'C' ग्रेड मिला है। एशिया की दूसरी सबसे बड़ी कंपनी को 'हिस्टोरिक' गिरावट का सामना करना पड़ा है।
महंगी बिजली, लेकिन सर्विस नदारद देश में सबसे खराब परफॉर्मेंस देने के बावजूद, MSEDCL के रेट आसमान छू रहे हैं। घरेलू कंज्यूमर: 8 से 13 रुपये प्रति यूनिट इंडस्ट्रियल कंज्यूमर: 1,088 रुपये प्रति यूनिट कमर्शियल कंज्यूमर: 18 रुपये प्रति यूनिट तक इतना पैसा देने के बाद भी कस्टमर बार-बार बिजली सप्लाई में रुकावट और खराब सर्विस का सामना कर रहे हैं। क्या सरकार की बेपरवाही इसकी वजह है? गुजरात जैसे राज्यों ने बिजली चोरी और स्मार्ट मीटरिंग के खिलाफ सख्त कार्रवाई करके अपनी कंपनियों को फायदा पहुंचाया है। लेकिन, महाराष्ट्र में ऑडिट चेतावनियों और कस्टमर की शिकायतों को लगातार नज़रअंदाज़ किया जा रहा है। जब तक प्रोफेशनल मैनेजमेंट और 100 परसेंट प्रीपेड स्मार्ट मीटरिंग जैसे उपाय लागू नहीं किए जाते, आम जनता की यह 'बिजली लूट' नहीं रुकेगी।
'महावितरण' क्यों फेल हुआ? बड़े पैमाने पर लीकेज और बिजली चोरी: महावितरण द्वारा सप्लाई की जाने वाली बिजली का 24.2 परसेंट लीकेज होता है। नेशनल एवरेज सिर्फ 16.3 परसेंट है। बिजली चोरी, बिना इजाज़त खेती के पंप और कमज़ोर एनफोर्समेंट के कारण होने वाले इस नुकसान का बोझ ईमानदार कस्टमर को एक्स्ट्रा बिल के रूप में उठाना पड़ रहा है। रिकवरी में बहुत धीमी रफ़्तार: देश की सबसे अच्छी बिजली कंपनियाँ 15 दिनों के अंदर बिल रिकवर कर लेती हैं। लेकिन, महावितरण को बिल रिकवर करने में एवरेज 200 दिन लगते हैं।
फाइनेंशियल मिसमैनेजमेंट: कंपनी पर अभी 20,000 करोड़ रुपये से ज़्यादा का कर्ज़ बकाया है। ऑडिटर्स ने कंपनी की फाइनेंशियल हालत पर गंभीर सवाल उठाए हैं। प्लानिंग की कमी: स्मार्ट मीटर लगाने में देरी, ग्रामीण इलाकों में खराब इंफ्रास्ट्रक्चर और अकाउंटेबिलिटी की कमी ने महावितरण को कमज़ोर कर दिया है। राज्य के अंदर तुलना, प्राइवेट कंपनियाँ दाईं ओर: एक ही रेगुलेटरी बॉडी के तहत काम करने के बावजूद,