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मुंबई : मुंबई, जिसकी हवा में कभी समंदर की नमकीन ताजगी और सपनों की महक हुआ करती थी, आज उसी शहर की हवा में प्रदूषण घुल चुका है। सपनों का शहर कहलाने वाली मुंबई अब कंक्रीट का ऐसा जंगल बन चुकी है, जहां सांस लेना भी चुनौती बन गया है। सुंदर मुंबई और वर्ल्ड क्लास इंफ्रास्ट्रक्चर के दावों के बीच आम मुंबईकर बीमारियों की मार झेल रहा है। चारों ओर उड़ती धूल, बेहिसाब निर्माण कार्य, उखड़ी सड़कें और धुएं के गुबार ने शहर के आसमान को धुंधला कर दिया है। जो शहर कभी रुकता नहीं था, आज वही मुंबई खांसते-खांसते हांफ रही है।

कंक्रीट का जंगल और जहरीली सांसें

शहर के कोने-कोने में चल रहे रीडेवलपमेंट, कोस्टल रोड, मेट्रो परियोजनाओं और तेजी से बढ़ते निर्माण कार्यों ने मुंबई की हवा को गंभीर रूप से प्रभावित किया है। नियम-कायदों की अनदेखी और हरित आवरण की कमी के बीच हो रहे निर्माण कार्यों ने वायु गुणवत्ता को चिंताजनक स्तर पर पहुंचा दिया है। मनपा और प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड समय-समय पर दिशा-निर्देश जारी करते हैं, लेकिन जमीनी हकीकत यह है कि मुंबईकर हर दिन प्रदूषित हवा में सांस लेने को मजबूर हैं।

खराब हवा से बढ़ रही परेशानी

केईएम, सायन, नायर सहित कई सरकारी और निजी अस्पतालों की ओपीडी में इन दिनों सांस संबंधी मरीजों की संख्या लगातार बढ़ रही है। सबसे अधिक असर बच्चों और बुजुर्गों पर पड़ रहा है। हर दूसरे घर में कोई न कोई लगातार खांसी, ब्रोंकाइटिस, अस्थमा या एलर्जी जैसी समस्याओं से जूझ रहा है। शहर को सुंदर बनाने की योजनाओं के बीच लोगों की सेहत पर बढ़ता खतरा चिंता का विषय बन गया है। सवाल उठ रहा है कि यदि लोगों को स्वच्छ हवा ही न मिले, तो विकास का क्या अर्थ रह जाता है।

मुंबईकरों का सवाल – यह विकास है या विनाश?

गिरगांव निवासी रवींद्र सावंत कहते हैं, ‘हमने अपनी पूरी जिंदगी मुंबई में बिताई है। पहले समंदर की हवा में ताजगी होती थी, लेकिन अब खिड़की खोलते ही घर में धूल की परत जम जाती है। नाती-पोतों को बाहर खेलने भेजने में डर लगता है।’ वहीं, कुर्ला निवासी सुनीता पाटील का कहना है, ‘अब डॉक्टर के यहां जाना राशन की दुकान जाने जैसा हो गया है। हर महीने बच्चों की नेबुलाइजर और दवाइयों पर हजारों रुपये खर्च हो रहे हैं। क्या हमें इसी स्मार्ट मुंबई का सपना दिखाया गया था?

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