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मुंबई: देश की आर्थिक राजधानी और सपनों की नगरी कही जाने वाली मुंबई पर जलवायु परिवर्तन का खतरा लगातार बढ़ता जा रहा है। समुद्र का बढ़ता जलस्तर, जमीन का धंसना, भारी बारिश और ऊंची समुद्री लहरें भविष्य में शहर के निचले इलाकों के लिए गंभीर संकट पैदा कर सकती हैं। संयुक्त राष्ट्र की हालिया रिपोर्ट में मुंबई समेत दक्षिण एशिया के कई तटीय शहरों को समुद्र के बढ़ते जलस्तर से खतरे को लेकर आगाह किया गया है। इसके बाद बृहन्मुंबई महानगरपालिका (बीएमसी) ने शहर के लिए नया क्लाइमेट रिस्क असेसमेंट शुरू कराया है।

इसका मतलब यह नहीं है कि पूरी मुंबई अचानक समुद्र में समा जाएगी। वैज्ञानिक चेतावनी मुख्य रूप से लंबे समय में समुद्र के बढ़ते स्तर से निचले तटीय इलाकों में स्थायी जलभराव, बार-बार बाढ़ और लोगों के विस्थापन के बढ़ते जोखिम को लेकर है। 2100 तक कितना बढ़ सकता है समुद्र का स्तर? संयुक्त राष्ट्र से जुड़ी हालिया रिपोर्ट के मुताबिक वर्ष 2024 में वैश्विक औसत समुद्र स्तर में रिकॉर्ड 5.9 मिलीमीटर की बढ़ोतरी दर्ज की गई थी। रिपोर्ट में आशंका जताई गई है कि उत्सर्जन में तेजी से कमी लाने के बावजूद इस सदी के आखिर यानी 2100 तक वैश्विक समुद्र स्तर कम से कम करीब आधा मीटर बढ़ सकता है।

वहीं बेहद प्रतिकूल परिस्थितियों और पश्चिमी अंटार्कटिक बर्फ की चादर में अस्थिरता जैसे कारकों के कारण वृद्धि दो मीटर तक पहुंचने की आशंका वाले परिदृश्य भी मौजूद हैं। मुंबई जैसे समुद्र किनारे बसे घनी आबादी वाले शहर के लिए यह खतरा बेहद महत्वपूर्ण हो जाता है। मुंबई को ज्यादा खतरा क्यों? मुंबई की भौगोलिक स्थिति इस संकट को और गंभीर बनाती है। शहर का बड़ा हिस्सा समुद्र के बेहद करीब है और कई इलाके कम ऊंचाई पर बसे हुए हैं। समुद्र का स्तर बढ़ने के साथ जमीन का धंसना यानी लैंड सब्सिडेंस भी जोखिम बढ़ा सकता है।

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