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मुंबई : जो डब्बावाले मुंबई शहर की पहचान हुआ करते थे, कोरोना वायरस ने एक झटके में उनकी और उनके परिवारवालों की दुनिया उजाड़ दी है। मुंबई में डब्बावालों का काम बंद हुए करीब 3 महीने हुए जा रहे हैं और आगे भी उनका काम शुरू होगा, इसका खुद उन्हें ही कोई भरोसा नहीं। कई डब्बावाले अपने-अपने गांव लौट गए हैं और वहीं काम तलाश रहे हैं। कुछ ने खेती का रास्ता अपनाया, लेकिन चक्रवाती तूफान निसर्ग उनके घरों के साथ-साथ खेतों को भी नुकसान पहुंचाया है। 

मुंबई डब्बावाला असोसिएशन के प्रवक्ता सुभाष तालेकर ने कहा कि अन्य असंगठित क्षेत्रों की तरह ही डब्बावालों को भी सरकार से मदद की जरूरत है। कोरोना वायरस के खतरे को देखते हुए डब्बावालों ने 19 मार्च को ही अपनी सेवाएं बंद कर दी थीं। सरकार अब मुंबई में कार्यालयों और कारोबार को खोलने की अनुमति दे रही है, लेकिन डब्बावाले अपनी सेवा के साथ कब लौटेंगे, इसको लेकर अनिश्चितता बरकरार है। तालेकर ने कहा, ‘हमारी सेवाएं पूरी तरह से लोकल ट्रेनों पर निर्भर हैं। हम लोकल ट्रेनों के शुरू होने तक अपनी सेवाएं भी शुरू नहीं कर सकते हैं। कौन जानता है कि ट्रेन सेवा कब शुरू होगी, जुलाई या अगस्त में?’ तालेकर ने कहा कि ग्राहकों की प्रतिक्रिया कैसी होगी, यह भी अनिश्चित है। 

तालेकर ने यह भी कहा कि शहर की ज्यादातर इमारतों, हाउसिंग सोसाइटीज ने रिश्तेदारों तक की एंट्री पर बैन लगाया हुआ है। क्या वे हमें खाना पहुंचाने और डब्बे ले जाने की मंजूरी देंगे, भले ही हम कितना भी मास्क और सेनिटाइजर के इस्तेमाल का ख्याल रखें। मुंबई में किसी भी आम दिन में 5,000 डब्बावाले कार्यालय जाने वालों को खाना पहुंचाते रहे हैं। ये सभी समय के पाबंद और तेजी के लिए जाने जाते हैं। 1998 में फॉर्ब्स पत्रिका ने इन्हें ‘सिक्स सिग्मा’ रेटिंग से नवाजा था। 


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