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मीरा-भाईंदर : मीरा-भाईंदर के करीब 6000 करोड़ रुपए मूल्य की 254।88 एकड़ जमीन को लेकर महाराष्ट्र में बड़ा कानूनी और राजनीतिक घमासान छिड़ गया है। विपक्ष के मोर्चा खोलते ही सरकार बैकफुट पर आ गई है। दरअसल बॉम्बे हाई कोर्ट द्वारा इस जमीन को प्राइवेट कंपनियों के पक्ष में मान्यता दिए जाने के बाद महाराष्ट्र सरकार अब सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाने जा रही है। राज्य सरकार ने इस मामले में स्पेशल लीव पिटीशन (एसएलपी) दाखिल करने का फैसला किया है। राजस्व मंत्री चंद्रशेखर बावनकुले ने साफ संदेश दिया है कि सरकारी जमीन पर कब्जा करने की किसी भी कोशिश को सफल नहीं होने दिया जाएगा। उन्होंने अधिकारियों को सुप्रीम कोर्ट में मजबूती से सरकार का पक्ष रखने के निर्देश दिए हैं। भाईंदर गांव स्थित इस 254।88 एकड़ जमीन को लेकर विवाद कई दशक पुराना है।

महाराष्ट्र सरकार का दावा है कि यह जमीन पूरी तरह सरकारी स्वामित्व वाली है। आरोप है कि 1948 से रेवेन्यू रिकॉर्ड में बिना अनुमति बदलाव किए गए और पहले ‘एस्टेट इन्वेस्टमेंट कंपनी’ तथा बाद में ‘मीरा साल्ट वर्क्स’ का नाम कथित तौर पर गैर-कानूनी तरीके से दर्ज कर दिया गया। 1958 में जमीन का उपयोग नमक उत्पादन के लिए शुरू हुआ, जिसके बाद केंद्र सरकार के साल्ट विभाग का नाम भी रिकॉर्ड में जोड़ा गया।

वहीं कांग्रेस नेता विजय वडेट्टीवार ने इस पूरे मामले में राज्य सरकार पर गंभीर आरोप लगाए हैं। उन्होंने कहा कि करोड़ों रुपये मूल्य की सरकारी जमीन को निजी डेवलपर्स के पक्ष में जाने देने के लिए प्रशासनिक स्तर पर जानबूझकर देरी की गई। वडेट्टीवार ने आरोप लगाया कि जिलाधिकारी द्वारा जमीन सरकार के नाम दर्ज करने के आदेश के बावजूद मामले की उच्च स्तर पर प्रभावी जांच नहीं हुई।


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