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मुंबई : राजनीति में एक बार फिर नए विवाद ने हलचल बढ़ा दी है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की तस्वीर हटाने को लेकर महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना और बीजेपी के बीच तकरार तेज हो गई है। इस विवाद का असर आने वाले समय में स्थानीय राजनीति और खासकर **कल्याण-डोंबिवली महानगरपालिका के सियासी समीकरणों पर पड़ सकता है। दरअसल, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की तस्वीर को लेकर उठे विवाद के बाद बीजेपी ने मनसे पर निशाना साधा है। वहीं राज ठाकरे के नेतृत्व वाली पार्टी अपने रुख पर कायम नजर आ रही है। ऐसे में सवाल उठ रहे हैं कि क्या इस विवाद का असर महाराष्ट्र में बने नए राजनीतिक समीकरणों पर पड़ेगा और क्या राज ठाकरे का 'भगवा साथ' कमजोर होगा।

फोटो विवाद से शुरू हुई सियासी लड़ाई मामला उस समय सामने आया जब पुणे के एक सरकारी संस्थान में छत्रपति शिवाजी महाराज की तस्वीर के साथ प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की तस्वीर लगाए जाने पर आपत्ति जताई गई। मनसे नेता अमित ठाकरे ने इस पर विरोध दर्ज कराया और उनके समर्थकों द्वारा पीएम मोदी की तस्वीर हटाने का मामला सामने आया। इसके बाद पुलिस ने अमित ठाकरे और कुछ मनसे कार्यकर्ताओं के खिलाफ मामला दर्ज किया। बीजेपी ने इस कार्रवाई को राजनीतिक अपरिपक्वता बताते हुए मनसे पर हमला बोला। वहीं मनसे की ओर से कहा गया कि उनका विरोध किसी व्यक्ति के खिलाफ नहीं बल्कि तस्वीर लगाने के तरीके को लेकर था।

केडीएमसी चुनाव से पहले बढ़ी चिंता कल्याण-डोंबिवली महानगरपालिका की राजनीति में बीजेपी और मनसे के बीच नजदीकियों को लेकर लंबे समय से चर्चा रही है। राज ठाकरे की पार्टी ने पिछले कुछ समय में हिंदुत्व और भगवा राजनीति के मुद्दों पर अपना रुख मजबूत किया है। ऐसे में बीजेपी के साथ संभावित तालमेल को लेकर भी राजनीतिक कयास लगाए जाते रहे हैं। अब पीएम मोदी की तस्वीर वाले विवाद के बाद दोनों दलों के बीच दूरी बढ़ने की अटकलें लगाई जा रही हैं। राजनीतिक जानकार मानते हैं कि स्थानीय निकाय चुनावों से पहले छोटे विवाद भी बड़े गठबंधन समीकरणों को प्रभावित कर सकते हैं।

बीजेपी के लिए क्यों अहम है मामला? महाराष्ट्र में बीजेपी लंबे समय से हिंदुत्व के मुद्दे पर अपनी राजनीति करती रही है। राज ठाकरे की मनसे भी मराठी अस्मिता के साथ-साथ हिंदुत्व के मुद्दों पर सक्रिय रही है। ऐसे में दोनों दलों के बीच किसी भी तरह का टकराव राजनीतिक संदेश के तौर पर देखा जाता है। बीजेपी चाहती है कि हिंदुत्व वोटों का बंटवारा कम हो, जबकि मनसे अपनी अलग राजनीतिक पहचान बनाए रखने की कोशिश करती है। 

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