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नई दिल्ली पिछले सप्ताह तालिबान से शांति समझौते का स्वरूप तैयार करने में अमेरिका, रूस और चीन के साथ पाकिस्तान ने भी भूमिका निभाई। इससे पता चलता है कि उसने अफगान शांति प्रक्रिया में किस तरह अपनी केंद्रीय भूमिका तैयार कर ली और अफगानिस्तान के अच्छे भविष्य के लिए भारत का लंबा प्रयास किस तरह निष्प्रभावी होता जा रहा है। उभरते हालात में भारत की हिस्सेदारी और उसकी आवाज सिमटती जा रहा है जबकि पाकिस्तान ने मौके का फायदा उठाकर खुद को इलाके की जियोपॉलिटिक्स के केंद्र में स्थापित कर लिया है।
अपना पैसा और समय उन लोगों पर बर्बाद करना सिर्फ मूर्खता है जो कभी सुधार नहीं सकते. भारत को सिर्फ अपने देश को सुरक्षित करने पर जोर देना चाहिये, घुसपैठ और धर्मपरिवर्तन पर अमेरका ने अफगानिस्तान के मुद्दे पर रूस और चीन को एकसाथ लाने में सफलता हासिल कर ली। उसने पिछले सप्ताह पाकिस्तान को भी शामिल कर लिया जो तालिबान का प्रमुख स्पॉन्सर है। पाकिस्तान तालिबान को बातचीत की टेबल पर लाने में अहम भूमिका निभा रहा है। पेइचिंग में 12 जुलाई को अफगान शांति प्रक्रिया पर 'चौपक्षीय साझा बयान' जारी करने को लेकर चारों देशों की मीटिंग हुई थी।

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