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मुंबई : डॉक्टर सरकारी अस्पतालों में काम नहीं करना चाहते हैं। यह बात सामने आई है सरकारी अस्पतालों में अनिवार्य रूप से किए जाने वाले बॉन्ड सेवा के आंकड़ों से। डायरेक्ट्रेट ऑफ मेडिकल एजुकेशन ऐंड रिसर्च (डीएमईआर) से मिले आंकड़ों के अनुसार, राज्य में बॉन्डेड कैंडिडेट की 64 प्रतिशत पोस्ट अब भी खाली हैं, जिन्हें भरने के लिए प्रशासन को जद्दोजहद करनी पड़ रही है।
अस्पतालों में डॉक्टरों की अनुपलब्धता के कारण मरीजों को भयंकर मुसीबतों का सामना करना होता है, जिसका असर काम करने वाले डॉक्टरों के अलावा पूरे हेल्थ सिस्टम पर पड़ता है। प्रशासन बॉन्डेड कैंडिडेट को नियमित रूप से बॉन्ड सर्विस पूरी कराने के लिए तरह-तरह के प्रयोग करता रहा है, बावजूद इसके सरकारी अस्पतालों में डॉक्टर काम तो छोड़िए, एक साल का अनिवार्य बॉन्ड भी पूरा करने के लिए नहीं आ रहे हैं।

डीएमईआर से मिले आंकड़ों के अनुसार, इस साल राज्य में पोस्ट ग्रैजुएशन करने वाले स्टूडेंट्स के लिए म्युनिसिपल कॉर्पोरेशन सहित सरकारी अस्पतालों में कुल 2505 पद खाली थे, इनमें से सिर्फ 36 प्रतिशत पद ही भरे जा सके हैं। सरकारी अस्पतालों से मेडिकल की पढ़ाई करने वालों को एक साल का अनिवार्य रूप से बॉन्ड पूरा करना होता है। इसके तहत उन्हें एक साल तक सरकारी अस्पतालों में काम करना होता है।


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