यमुना प्राधिकरण जमीन घोटाले के 20 आरोपियों के खिलाफ कुर्की वारंट जारी
सिराजुद्दीन : एंटी करप्शन कोर्ट ने यमुना प्राधिकरण में हुए जमीन घोटाले में प्राधिकरण के परियोजना प्रबंधक समेत 20 आरोपियों के खिलाफ कुर्की वारंट जारी किए हैं। इन आरोपियों ने फर्जी कंपनियां बनाकर जमीन अधिग्रहण के माध्यम से प्राधिकरण को 126 करोड़ का नुकसान पहुंचाया गया था। वहीं, पुलिस ने आरोपियों की गिरफ्तारी के प्रयास तेज कर दिए हैं। शासन से हरी झंडी मिलने के बाद इस घोटाले में शामिल अधिकारियों व अन्य आरोपियों की मुश्किलें लगातार बढ़ती जा रही हैं। पिछले तीन दिनों में प्राधिकरण के पूर्व एसीईओ सतीश कुमार और पूर्व ओएसडी के साले अजित को पुलिस गिरफ्तार कर जेल भेज चुकी है। एंटी करप्शन कोर्ट द्वारा 20 आरोपियों की कुर्की के वारंट भी जारी कर दिए गए हैं। एंटी करप्शन कोर्ट के एडीजीसी सिराजुद्दीन अलवी ने इसकी पुष्टि करते हुए कहा कि इस घोटाले में शामिल यमुना प्राधिकरण के परियोजना प्रबंधक अतुल कुमार समेत बीस लोगों के कुर्की वारंट जारी हो चुके हैं। गौतमबुद्ध नगर, गाजियाबाद, बुलंदशहर, दिल्ली, लखनऊ, आगरा तथा इटावा में आरोपियों के घरों पर यह नोटिस चस्पा कर उन्हें कुर्की से पहले अंतिम चेतावनी दी गई है। यदि वे अब भी न्यायालय में पेश नहीं होते हैं तो उनके घरों की कुर्की की जाएगी।
इनके खिलाफ धारा-82 के नोटिस : अतुल कुमार प्रबंधक परियोजना यमुना प्राधिकरण, मदनपाल सिंह निवासी बुलंदशहर, निर्दोष निवासी गाजियाबाद, स्वातिदीप शर्मा निवासी लखनऊ, स्वदेश गुप्ता, प्रमोद कुमार यादव निवासी ग्रेटर नोएडा, सोनाली निवासी लखनऊ, निधि चतुर्वेदी निवीसी डीडीए साइट न्यू राजेंद्र नगर दिल्ली, नंदकिशोर, दीपांकर चतुर्वेदी निवीसी डीडीए साइट न्यू राजेन्द्र नगर दिल्ली, मान सिंह यादव निवासी सी 50 आवास विकास कॉलोनी इटावा, मीना यादव निवासी सी 50 आवास विकास कालोनी इटावा, परमेन्द्र सिंह निवासी राजनगर गाजियाबाद, दलजीत शर्मा, धीरेन्द्र निवासी अर्जुन नगर कालोनी आगरा, चमन सिंह, सुरेश चन्द, विवेक कुमार जैन, नरोतम जैन और रश्मि जैन।
इस मामले को जुलाई 2018 में सीबीआई के पास जांच के लिए भेजा गया था। सीबीआई ने इसकी जांच करने से इनकार कर दिया था। अब अगस्त में एक बार फिर से जिला पुलिस ने सीबीआई जांच की सिफारिश शासन से की थी लेकिन यह रिपोर्ट अभी तक शासन में ही लंबित पड़ी है।
भूमि अधिग्रहण के इस खेल में यमुना प्राधिकरण को 126 करोड़ रुपये का नुकसान हुआ था। इस मामले में यमुना औद्योगिक विकास प्राधिकरण के तत्कालीन मुख्य कार्यपालक अधिकारी (आईएएस) पीसी गुप्ता, तहसीलदार सुरेश चंद शर्मा, संजीव कुमार, जितेंद्र चौहान, विवेक कुमार जैन, सुरेंद्र सिंह, मदन पाल, अजीत कुमार, योगेश कुमार, वीरेंद्र चौहान, निर्दोष चौधरी, गौरव कुमार, मनोज कुमार ,अनिल कुमार, स्वाति दीप शर्मा, सुदेश गुप्ता, सोनाली, प्रमोद कुमार यादव, निधि चतुर्वेदी, सहित 22 लोगों के खिलाफ मामला दर्ज हुआ था।
प्राधिकरण के तत्कालीन सीईओ पीसी गुप्ता ने अफसरों, परिचितों व रिश्तेदारों के साथ मिलकर 19 शेल कंपनियां बनाई थीं। इन कंपनियों के माध्यम से मथुरा जिले के सात गांवों में 97 हेक्टेयर जमीन खरीदी गई। इसके बाद जमीन प्राधिकरण को बेची गई थी। घोटाले से मिली रकम में से कुछ हिस्से में से इन्हीं कंपनियों के नाम पर मथुरा और उसके आसपास के इलाकों में करीब 57 एकड़ जमीन खरीदी गई थी। इनके कुछ बैनामे अब न्यायालय के आदेश से निरस्त हो चुके हैं, जबकि अन्य को निरस्त कराने की कार्रवाई चल रही है।
आरोपी कुर्की की कार्रवाई से बचने के लिए आत्मसमर्पण की तैयारी में हैं। घोटाले के मास्टर माइंड माने जाने वाले विवेक जैन की पत्नी रश्मि जैन और पिता नरोतम जैन ने अग्रिम जमानत के लिए एंटी करप्शन कोर्ट में अर्जी डाल दी है। इस पर 24 दिसंबर को सुनवाई होनी है। 10 और आरोपियों द्वारा अग्रिम जमानत लेने की कवायद की जा रही है। वे अपने अधिवक्ताओं के माध्यम से कागज तैयार कराने में लगे हैं। सबसे पहली गिरफ्तारी तत्कालीन सीईओ पीसी गुप्ता की हुई थी। उन्हें 22 जून 2018 को मध्यप्रदेश के दतिया से गिरफ्तार किया गया था। वह इस समय जेल में बंद हैं। इसके बाद 15 दिसंबर 2019 को एसीईओ सतीश कुमार को उनके ग्रेटर नोएडा स्थित आवास से गिरफ्तार किया गया। उसके बाद तत्कालीन ओएसडी के साले अजित को बुलंदशहर से गिरफ्तार किया गया। यमुना प्राधिकरण में तैनात इंस्पेक्टर गजेंद्र सिंह ने थाना कासना में 3 जून 2018 को रिपोर्ट दर्ज कराई थी कि प्राधिकरण के अंतर्गत आने वाले मथुरा के सात गांवों में 97 हेक्टेयर भूमि को कई फर्जी कंपनियां बनाकर खरीदा गया। मास्टर प्लान में यह क्षेत्र नहीं होने के बावजूद इस जमीन का यमुना विकास प्राधिकरण द्वारा अधिग्रहण किया गया।
इस घोटाले की जांच सीबीआई से किए जाने की भी संस्तुति की गई थी। जांच शुरू किए जाने से पहले ही सीबीआई के एक इंस्पेक्टर का नाम भी इस मामले में आ गया था। सह अभियुक्त तहसीलदार रणवीर सिंह को रिश्वत देने और सीबीआई के इंस्पेक्टर को रिश्वत लेने के आरोप में गिरफ्तार किया जा चुका है।
इस केस की जांच तत्कालीन ग्रेटर नोएडा प्रथम सीओ अमित किशोर श्रीवास्तव कर रहे थे। उनके स्थानांतरण के बाद जांच सीओ निशांक शर्मा ने की थी। जांच में छह कंपनियों और कई लोगों के नाम सामने आए थे। पुलिस ने दावा किया कि केस में 36 से अधिक आरोपियों के नाम सामने आए हैं। इसमें कुछ बिल्डर और सफेदपोश नेता भी थे।