कल्याण : मुलुक जाने को छटपटा रहे उत्तर भारतीय, लाकडाउन खत्म होने का इंतजार
कल्याण : कोरोना वायरस से सबसे ज्यादा ग्रस्त महाराष्ट्र में रहने वाले लाखों उत्तर भारतीय अपने मुलुक जाने के लिए छटपटा रहे हैं. लाकडाउन के कारण ट्रेनें न चलने से वे घर में रहने को मजबूर हैं. कामकाज ठप होने और कहीं आने जाने पर रोक के कारण लोग ऊब गए हैं. परिवार सहित रहने वाले लोगों का हाल तो कुछ हद तक ठीक है लेकिन अकेले रहने वाले घुट-घुट कर रहने को मजबूर हैं. बहुत सारे उत्तर भारतीय फसल की कटाई के लिए हर साल इस समय गांव जाते हैं और कटाई व मड़ाई करके वापस अपनी कर्मभूमि मुंबई आ जाते हैं. गर्मी में बच्चों की स्कूल से छुट्टी हो जाने पर शादी-ब्याह में शामिल होने भी अधिकतर लोग गांव जाते हैं, जो इस वर्ष नहीं जा पा रहे हैं. बहुत से लोगों को उम्मीद है कि 3 मई को लाकडाउन खत्म होगा और ट्रेनें चलने लगेंगी और वे अपनी जन्मभूमि पहुंच जाएंगे.
कल्याण में रहने वाले शिक्षक राजेंद्र मिश्र ने बताया कि लगता है इस साल गर्मी की छुट्टियाँ बेकार ही जाएंगी. हर साल यह समय गांव में बड़े आनंद से बीतता था. गांव वालों के अलावा रिश्तेदारों से मिलना हो जाता था. इनके जैसे हजारों लोग गांव जाने को व्याकुल हैं. फिर भी वे लाकडाउन का पालन करते हुए कोरोना से जंग लड़ रहे हैं.
यहीं पर रहने वाले जौनपुर के श्याम सिंह ने बताया कि वह अपने पड़ोसी सुरेंद्र के साथ रहता है. दोनों रिक्शा चलाकर परिवार का पालन पोषण करते हैं. सुरेंद्र लाकडाउन शुरू होने से एक दिन पहले गांव पहुंच गया, वह फंस गया. अब यहां एक एक दिन बिताना भारी पड़ रहा है. गांव में गेहूं कटाई के लिए मजदूर नहीं मिल रहे हैं, सोचा था वहां पहुंच कर परिवार का हाथ बंटाऊंगा लेकिन सारी उम्मीदों पर पानी फिर गया. अब यहां खाने के भी लाले पड़े हैं.
नवी मुंबई के ऐरोली में रहने वाले लालबहादुर यादव का भी हाल इन लोगों जैसा ही है. कहते हैं लाकडाउन खत्म होने का बेसब्री से इंतजार है. जिसके खत्म होते ही मुलुक जाऊंगा. बच्चे भी यहां घर में रहकर ऊब गए हैं. गांव में माता पिता टीवी पर कोरोना की खबर सुन कर घबरा गए हैं. यहां से कुछ लोग गांव जाकर इस बीमारी को लेकर ज्यादा ही अफवाह फैला दिये हैं.
कलंबोली के रहिवासी लखन पाल चाय की दुकान चलाते हैं, जो लाकडाउन के कारण बंद हैं. भाड़े के रूम में पत्नी और 2 बच्चों के साथ रहते हैं. अब परिवार चलाना भारी पड़ रहा है. गर्मी में गांव जाते थे और कुछ अनाज व अन्य वस्तुएं लाते थे. ट्रेन न चलने से यहां रहने को मजबूर हैं. लेकिन अब घर में बैठ कर घर का खर्च कैसे चलाएं समझ नहीं पा रहे. ऐसे ही मायानगरी में फंसे हजारों लोग शरीर से भले ही यहां हैं परन्तु दिल जन्मभूमि पर लगा है.