कुंभ बजट का 0.1% शिक्षा को मिले तो सैकड़ों स्कूल बच सकते हैं: जस्टिस प्रसन्ना बी. वराले
मुंबई : देश में बड़े धार्मिक और सांस्कृतिक आयोजनों के लिए होने वाले भारी-भरकम खर्च के बीच शिक्षा व्यवस्था और सरकारी स्कूलों की स्थिति को लेकर सुप्रीम कोर्ट के जज जस्टिस प्रसन्ना बी. वराले की टिप्पणी ने नई बहस छेड़ दी है। महाराष्ट्र में एक कार्यक्रम के दौरान शिक्षा व्यवस्था पर चर्चा करते हुए उन्होंने कहा कि यदि कुंभ मेले के बजट का केवल 0.1 प्रतिशत हिस्सा भी स्कूलों को उपलब्ध कराया जाता, तो राज्य के सैकड़ों स्कूलों को बचाया जा सकता था।
जस्टिस वराले ने यह टिप्पणी ऐसे समय में की, जब महाराष्ट्र सरकार की ओर से नासिक कुंभ मेले के लिए बड़े स्तर पर बुनियादी ढांचे के विकास की योजनाएं बताई गई हैं। उनके मुताबिक, सरकार विकास कार्यों पर बड़ी राशि खर्च कर रही है, जिस पर उन्हें कोई आपत्ति नहीं है। हालांकि, उन्होंने शिक्षा के क्षेत्र में संसाधनों की जरूरत को रेखांकित करते हुए सरकारी प्राथमिकताओं पर विचार करने की बात कही।
34 हजार करोड़ के इंफ्रास्ट्रक्चर खर्च का जिक्र
कार्यक्रम के दौरान जस्टिस वराले ने महाराष्ट्र सरकार की ओर से नासिक कुंभ मेले के इंफ्रास्ट्रक्चर के लिए प्रस्तावित करीब 34,000 करोड़ रुपये के खर्च का उल्लेख किया। इसके अलावा कॉरिडोर प्रोजेक्ट के लिए करीब 11,000 करोड़ रुपये खर्च किए जाने की घोषणा का भी संदर्भ सामने आया। उन्होंने कहा कि बड़े धार्मिक आयोजन के लिए आधारभूत ढांचे का निर्माण और विकास कार्य करना सरकार की जरूरतों का हिस्सा हो सकता है। उन्होंने यह स्पष्ट किया कि विकास कार्यों पर खर्च किए जाने वाले इस तरह के बड़े बजट पर उन्हें आपत्ति नहीं है।
हालांकि, इसी संदर्भ में उन्होंने शिक्षा के क्षेत्र की स्थिति पर ध्यान आकर्षित किया और सवाल उठाया कि यदि इस बड़ी राशि का बहुत छोटा हिस्सा भी स्कूलों को मजबूत करने में लगाया जाए, तो इसका समाज पर कितना व्यापक प्रभाव पड़ सकता है। 0.1 प्रतिशत बजट का उदाहरण जस्टिस वराले ने कहा कि कुंभ मेले के लिए आवंटित बजट का यदि सिर्फ 0.1 प्रतिशत हिस्सा शिक्षा व्यवस्था को मिल जाता तो महाराष्ट्र में बंद पड़े बड़ी संख्या में क्षेत्रीय भाषा के स्कूलों को बचाया जा सकता था।
उन्होंने अनुमान के तौर पर बताया कि करीब 32 करोड़ रुपये की राशि से राज्य में बंद पड़े लगभग 100 से 125 मराठी माध्यम के स्कूलों को बचाने में मदद मिल सकती थी। उनकी टिप्पणी का मूल उद्देश्य शिक्षा के लिए पर्याप्त संसाधन उपलब्ध कराने की आवश्यकता पर जोर देना था। उन्होंने यह संकेत दिया कि शिक्षा के क्षेत्र में अपेक्षाकृत छोटी राशि का निवेश भी लंबे समय में समाज के लिए बड़ा परिणाम दे सकता है। मराठी माध्यम के स्कूलों की स्थिति पर चिंता महाराष्ट्र में मराठी माध्यम के स्कूलों का मुद्दा लंबे समय से चर्चा में रहा है। कई स्थानों पर विद्यार्थियों की संख्या कम होने, बुनियादी सुविधाओं की कमी और प्रशासनिक कारणों से स्कूलों के संचालन पर असर पड़ा है। जस्टिस वराले ने क्षेत्रीय भाषा के स्कूलों का उल्लेख करते हुए शिक्षा और भाषा के बीच संबंध को भी अप्रत्यक्ष रूप से रेखांकित किया। स्थानीय भाषा में शिक्षा उपलब्ध कराने वाले स्कूल ग्रामीण और आर्थिक रूप से कमजोर वर्गों के बच्चों के लिए महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।